आंखे दिन की सफ़ेद रोशनी में अपनी परिधि में आने वाली हर एक चीज़ को ग्रहण करती चली जाती है. यह दृश्यों और घटनाओ को इस तरह समेटती है जैसे अंदर कोई विशाल कुंड हो और लालायित आँखे उस कुंड को भरने की कोशिश में लगी रहती हैं और जब पलके अंधेरे की चादर ओढ़ लेती हैं तो वही देखी हुई सारी चीजे उस कुंड में एकाकार होने लगती हैं.
अब यही सारी बाते और देखी हुई चीजे बिगडे आधे-अधूरे क्रम में एक दुसरे में घुलती चली जाती हैं और तब इनकी छटनी होती है और अपशिष्ट की तरह कुछ बाते स्मृति से निकाल दी जाती हैं.और तब वक्त आता है निर्विकार व टूटी बातों को समेटने का.
दिन की आकृतियों व अंधेरे की आकृतियों में सिर्फ़ यही अन्तर होता है कि दिन में बातें आँखों की सहायता से मस्तिष्क तक पहुँचती है जबकि अंधेरे की आकृतिया मस्तिष्क में पैदा होकर आँखों तक पहुँचती है जिन्हें हम “स्वप्न” कहते हैं. अंधेरे की आकृतिया ऐसी लगती है मानों कोई घुसपैठी मुख्य द्वार से न आकर पीछे के द्वार से आया हो!
उस समय ऐसा लगता है जैसे अचानक आए इस घुसपैठी से शरीर दंग हैं. ना हलचल – ना आहट और मूक बनकर हम इन दृश्यों के आगे मानो समर्पण कर देते हैं. और हम बिना किसी पाश के भी पाशबद्ध हो जाते हैं. और अचेतन मस्तिष्क द्वारा बनाये गए नाटक का मंचन होता है. तभी रोशनी मुक्ति मोर्चा संभाले मुख्य द्वार पर खटखटाती है और सत्तारूढ़ आकृति छु हो जाती है.
क्या आप जानते हैं ये दोनों कौन है? एक स्वप्न है तो एक हकीकत है. कृष्ण और श्वेत कभी एकाकार नही हो सकते अन्यथा दोनों ही अपनी पहचान खो देंगे. आजकल अंधेरे में सफ़ेद रोशनी जलाई जा रही है.ये वो आँखे हैं जो सो नही पाती व कृत्रिम रोशनी में भी कुंड भरने की कोशिश करती हैं. वही दूसरी तरफ़ वो लोग हैं जो उजली रोशनी में भी जबरन अन्धकार करके सोने की कोशिश करते हैं. ये लोग दिवास्वप्न बुनने वाले होते हैं जो हकीकत से ज्यादा सपनो की बनावती दुनिया में खुश रहते हैं रात और दिन दोनों की अपनी अपनी सत्ता है,अपनी-अपनी महत्ता है और यही साश्वत सत्य है की दोनों कभी नही मिल सकते, एक के आगमन पर दुसरे को जाना ही होता है