यह कैसा आइना है?

 

वक्त के साथ-साथ आज रिश्तों के मायने व इनकी सहनशीलता में भी बदलाव आ रहा है. आज टी.वी. सीरियल्स भी रिश्तो का मखौल उड़ाते नज़र आ रहे हैं. कुछ लोग इस बात को तूल देते हैं की ये भी समाज का ही आएना है. जबकि सच तो ये है की लोगो के आकर्षण व टी.आर.पी  के लिए यह अस्वस्थ मानसिकता समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को परोसी जा रही है. आज बच्चे भी इन सीरियल्स के नाटकीय मोड़,बदले और आक्रोश को दर्शाती धुनों से जैसे मुह बाये विस्मृत से खड़े देखते रहते हैं मसलन ज़ोर का चाँटा,चीखना -चिल्लाना,छिप कर बातें सुनना,चुगली करना, द्वेष व इर्ष्या के चलते दूसरो को भड़काना, बजाय साठ-गांठ करने के एक दुसरे को नीचा दिखाने के अवसर ढूँढना आदि …
 
हालाँकि ये सब संयुक्त परिवारों में सदियों से होता आया है, लेकिन एक और तो हम आज सभ्यता व संस्कृति के विकास की बड़ी बड़ी डींगे मारते हैं और पढ़े लिखे लोगो की वृद्धि का दावा करते हैं फिर इस तरह की कुत्सित और अस्वस्थ वृतियों को परोसकर हम क्यूँ वापस समाज को उसी ढर्रे पर खड़ा करना चाहते हैं?

प्रश्न यह उठता है की जब स्वस्थ मानसिकता वाले लोग इससे बार-बार देखते हैं तो क्या अनायास ही ये उनके ज़हन में अंकित नही हो जाता? एक परिस्थिति आती है जब घर में सभी कुछ सामान्य होता है, लेकिन किसी विशेष दृश्य को याद कर गृहणियां लगभग उसका नकारात्मक अर्थ निकाल लेती हैं  और इस तरह होती है झगडे और कलह की शुरुवात.इन सीरियल्स में सास-बहु के रिश्ते की धच्चियां उड़ा दी है. आज हर सास को उसकी बहु घर तोड़ने वाली और गुस्से वाली ही प्रतीत होती है. और उन्हें यह सब सोचते हुए अटपटा भी नही लगता क्योंकि हर दिन अपने घर के छोटे से डिब्बे में वो ये देख कर इसी के आदी हो जाते हैं.

जंहा एक और इस तरह के धारावाहिकों से संवादहीनता आई है वहीँ रिश्तो को बढ़ा-चढा कर दिखाने से आपसी तनाव और असीमित अपेक्षाए भी पैदा हुई है. आज देर सही पर हर एक समझदार आदमी यह मानता है की ये सीरियल्स एक धीमा ज़हर है जो रिश्तों को बेवजह खोखला कर रहा है.

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