कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?
आज भी पीड़ा अग्नि में मनु-मन जल रहा है.
आज भी हम वक्त से मजबूर हैं
खुशियों के ताज से कोसों दूर हैं
आज भी विधाता के नियमों का चिटठा खल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?
आज भी गरीब चंद टुकडो को रो रहा है
आंसुओ से कपोल-कालिख धो रहा है
आज भी ज़माना उसे दुर्दशा की कडाही में तल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?
अमीरों का सुनहरा ख्वाब अब भी अधलिखा है
कुछ अरमानो का दरवाज़ा उन्हें अब भी अनदिखा है
तो कुछ के भाग्य का सूरज पूर्ण होकर ढल रहा है
फिर कौन कहता है ज़मान बदल रहा है?
आज भी समाज सुधारक के मथ्थे बदनामी ही आती है
आज भी उनकी कीमत नगण्य आंकी जाती है
आज भी तानाशाह उन्हें गोलियों से छलनी कर रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?
आज भी आदमी का ईमान बिक रहा है
पेट भरने के लिए उल्टे तरीके सीख रहा है
एक आग बुझाने सौ आग में जल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?
आज भी माँ अपनी संतानों को रोती है
न पूर्णतः उनको पाती है, न पूर्णतः उनको खोती है
हकों की डोर थामे, बेटा कर्तव्यों से टल रहा है
फिर कौन कहता है ज़मान बदल रहा है
आज भी बहुए सम्मान को तरसती हैं
अंतर्मन में अनकही पीड़ा से सिसकती है
दो घर होकर भी अकेलापन उन्हें निगल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?
आज भी वे परिपक्वता के सांचे में तोली जाती है
आज भी उनकी तुच्छ भूले सरे आम खोली जाती है
आज भी विशेषाधिकारी पति उन्हें छल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?
आज भी अन्याय देख कर हम अनदेखा करते हैं
आवाज होते हुए भी उठाने से डरते हैं
यूँ इंसान पैर होते हुए भी बैशाखी से चल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है???