यह कैसा आइना है?

दिसम्बर 5, 2008

 

वक्त के साथ-साथ आज रिश्तों के मायने व इनकी सहनशीलता में भी बदलाव आ रहा है. आज टी.वी. सीरियल्स भी रिश्तो का मखौल उड़ाते नज़र आ रहे हैं. कुछ लोग इस बात को तूल देते हैं की ये भी समाज का ही आएना है. जबकि सच तो ये है की लोगो के आकर्षण व टी.आर.पी  के लिए यह अस्वस्थ मानसिकता समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को परोसी जा रही है. आज बच्चे भी इन सीरियल्स के नाटकीय मोड़,बदले और आक्रोश को दर्शाती धुनों से जैसे मुह बाये विस्मृत से खड़े देखते रहते हैं मसलन ज़ोर का चाँटा,चीखना -चिल्लाना,छिप कर बातें सुनना,चुगली करना, द्वेष व इर्ष्या के चलते दूसरो को भड़काना, बजाय साठ-गांठ करने के एक दुसरे को नीचा दिखाने के अवसर ढूँढना आदि …
 
हालाँकि ये सब संयुक्त परिवारों में सदियों से होता आया है, लेकिन एक और तो हम आज सभ्यता व संस्कृति के विकास की बड़ी बड़ी डींगे मारते हैं और पढ़े लिखे लोगो की वृद्धि का दावा करते हैं फिर इस तरह की कुत्सित और अस्वस्थ वृतियों को परोसकर हम क्यूँ वापस समाज को उसी ढर्रे पर खड़ा करना चाहते हैं?

प्रश्न यह उठता है की जब स्वस्थ मानसिकता वाले लोग इससे बार-बार देखते हैं तो क्या अनायास ही ये उनके ज़हन में अंकित नही हो जाता? एक परिस्थिति आती है जब घर में सभी कुछ सामान्य होता है, लेकिन किसी विशेष दृश्य को याद कर गृहणियां लगभग उसका नकारात्मक अर्थ निकाल लेती हैं  और इस तरह होती है झगडे और कलह की शुरुवात.इन सीरियल्स में सास-बहु के रिश्ते की धच्चियां उड़ा दी है. आज हर सास को उसकी बहु घर तोड़ने वाली और गुस्से वाली ही प्रतीत होती है. और उन्हें यह सब सोचते हुए अटपटा भी नही लगता क्योंकि हर दिन अपने घर के छोटे से डिब्बे में वो ये देख कर इसी के आदी हो जाते हैं.

जंहा एक और इस तरह के धारावाहिकों से संवादहीनता आई है वहीँ रिश्तो को बढ़ा-चढा कर दिखाने से आपसी तनाव और असीमित अपेक्षाए भी पैदा हुई है. आज देर सही पर हर एक समझदार आदमी यह मानता है की ये सीरियल्स एक धीमा ज़हर है जो रिश्तों को बेवजह खोखला कर रहा है.

“स्वप्न और हकीक़त”

दिसम्बर 5, 2008

 

आंखे दिन की सफ़ेद रोशनी में अपनी परिधि में आने वाली हर एक चीज़ को ग्रहण करती चली जाती है. यह दृश्यों और घटनाओ को इस तरह समेटती है जैसे अंदर कोई विशाल कुंड हो और लालायित आँखे उस कुंड को भरने की कोशिश में लगी रहती हैं और जब पलके अंधेरे की चादर ओढ़ लेती हैं तो वही देखी हुई सारी चीजे उस कुंड में एकाकार होने लगती हैं.

अब यही सारी बाते और देखी हुई चीजे बिगडे आधे-अधूरे क्रम में एक दुसरे में घुलती चली जाती हैं और तब इनकी छटनी होती है और अपशिष्ट की तरह कुछ बाते स्मृति से निकाल दी जाती हैं.और तब वक्त आता है निर्विकार व टूटी बातों को समेटने का.

दिन की आकृतियों व अंधेरे की आकृतियों में सिर्फ़ यही अन्तर होता है कि दिन में बातें आँखों की सहायता से मस्तिष्क तक पहुँचती है जबकि अंधेरे की आकृतिया मस्तिष्क में पैदा होकर आँखों तक पहुँचती है जिन्हें हम “स्वप्न” कहते हैं. अंधेरे की आकृतिया ऐसी लगती है मानों कोई घुसपैठी मुख्य द्वार से न आकर पीछे के द्वार से आया हो!
उस समय ऐसा लगता है जैसे अचानक आए इस घुसपैठी से शरीर दंग हैं.  ना हलचल – ना आहट और मूक बनकर हम इन दृश्यों के आगे मानो समर्पण कर देते हैं. और हम बिना किसी पाश के भी पाशबद्ध हो जाते हैं. और अचेतन मस्तिष्क द्वारा बनाये गए नाटक का मंचन होता है. तभी रोशनी मुक्ति मोर्चा संभाले मुख्य द्वार पर खटखटाती है और सत्तारूढ़ आकृति छु हो जाती है.

क्या आप जानते हैं ये दोनों कौन है? एक स्वप्न है तो एक हकीकत है. कृष्ण और श्वेत कभी एकाकार नही हो सकते अन्यथा दोनों ही अपनी पहचान खो देंगे. आजकल अंधेरे में सफ़ेद रोशनी जलाई जा रही है.ये वो आँखे हैं जो सो नही पाती व कृत्रिम रोशनी में भी कुंड भरने की कोशिश करती हैं. वही दूसरी तरफ़ वो लोग हैं जो उजली रोशनी में भी जबरन अन्धकार करके सोने की कोशिश करते हैं. ये लोग दिवास्वप्न बुनने वाले होते हैं जो हकीकत से ज्यादा सपनो की बनावती दुनिया में खुश रहते हैं रात और दिन दोनों की अपनी अपनी सत्ता है,अपनी-अपनी महत्ता है और यही साश्वत सत्य है की दोनों कभी नही मिल सकते, एक के आगमन पर दुसरे को जाना ही होता है

“बोझ की गठरी”

दिसम्बर 5, 2008

 

दिल के बोझ की गठरी संभल के उतारना
जीत को दूर जाते देख कर ही हारना
हारना मत इन आंसुओ से आसानी से
हो सके तो इन्हे दिल में ही मारना.

गठरी उतरी तो पल भर थकान मिट जायेगी
फिर चाहोगे सहारा, सूनी आंखे थक जायेगी
मत पालो इन वैशाखियो को अपने ज़हन में
ज़िन्दगी फिर बिन बैशाखी न चल पायेगी

कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?

दिसम्बर 5, 2008

 

कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?
आज भी पीड़ा अग्नि में मनु-मन जल रहा है.

आज भी हम वक्त से मजबूर हैं
खुशियों के ताज से कोसों दूर हैं
आज भी विधाता के नियमों का चिटठा खल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?

आज भी गरीब चंद टुकडो को रो रहा है
आंसुओ से कपोल-कालिख धो रहा है
आज भी ज़माना उसे दुर्दशा की कडाही में तल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?

अमीरों का सुनहरा ख्वाब अब भी अधलिखा है
कुछ अरमानो का दरवाज़ा उन्हें अब भी अनदिखा है
तो कुछ के भाग्य का सूरज पूर्ण होकर ढल रहा है
फिर कौन कहता है ज़मान बदल रहा है?

आज भी समाज सुधारक के मथ्थे बदनामी ही आती है
आज भी उनकी कीमत नगण्य आंकी जाती है
आज भी तानाशाह उन्हें गोलियों से छलनी कर रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?

आज भी आदमी का ईमान बिक रहा है
पेट भरने के लिए उल्टे तरीके सीख रहा है
एक आग बुझाने सौ आग में जल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?

आज भी माँ अपनी संतानों को रोती है
न पूर्णतः उनको पाती है, न पूर्णतः उनको खोती है
हकों की डोर थामे, बेटा कर्तव्यों से टल रहा है
फिर कौन कहता है ज़मान बदल रहा है

आज भी बहुए सम्मान को तरसती हैं
अंतर्मन में अनकही पीड़ा से सिसकती है
दो घर होकर भी अकेलापन उन्हें निगल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?

आज भी वे परिपक्वता के सांचे में तोली जाती है
आज भी उनकी तुच्छ भूले सरे आम खोली जाती है
आज भी विशेषाधिकारी पति उन्हें  छल रहा  है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है?

आज भी अन्याय देख कर हम अनदेखा करते हैं
आवाज होते हुए भी उठाने से डरते हैं
यूँ इंसान पैर होते हुए भी बैशाखी से चल रहा है
फिर कौन कहता है ज़माना बदल रहा है???

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय!!!

दिसम्बर 5, 2008

 

 

पुनर्जन्म की बहुत सी घटनाये हम सुनते हैं ऐसी ही एक घटना के बारे में बताते हुए परामनोवैज्ञानिक स्टीवेंसन लिखते हैं,
” एक व्यक्ति ने दुसरे के ५०,००० रुपए चुरा लिए. उस आदमी को बहुत दुःख हुआ और उसने कहा ‘भाई मेरे रुपए लौटा दो, यह मेरे मेहनत की कमाई है’ लेकिन फिर भी उसके रुपए नही लौटाए गए. उसने चोर को भरे गले से इतना ही कहा ‘तुम्हे इसकी कीमत एक दिन ज़रूर चुकानी पड़ेगी’ और इसी दुःख में उसकी मृत्यु हो गई .

ठीक नौ महीने बाद उस चोर के घर में बेटा पैदा हुआ. लेकिन धीरे-धीरे उसे कई बिमारियों ने जकड लिया ,अब चोरी करने वाले उस सेठ की चिंता बढती गई. बहुत इलाज़ करवाने पर भी लड़का ठीक नही हुआ. जिस दिन इलाज़ पर पुरे ५०,००० रु. लग गए उसी दिन वह लड़का चल बसा.उस छोटे से बच्चे ने बिल्कुल स्पष्ट कहा “मैंने अपने पैसे वसूल कर लिए हैं, मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नही है, मैं जा रहा हूँ.”

इस प्रकार की कितनी घटनाये होती हैं. किसी को कष्ट होता है की बीवी छोड़ के चली गई,तलाक हो गया या बेटा अलग रह रहा है, वह अकेलेपन से ग्रसित है या बहु ठीक से व्यवहार नही कर रही आदी…

सवाल यह उठता है की इसका उत्तरदायी कौन है? यह घटना क्यों घटित हुई? जब वर्तमान में कोई घटना घटित होती है तो आदमी को बड़ा कष्ट होता है लेकिन आदमी यह नही सोचता की अतीत में उसने ऐसा क्या किया. हम जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे रूप में जाने क्या-क्या बोल जाते हैं या क्या-क्या कर डालते हैं, लेकिन जब वही सब कुछ हमारे साठ होता है तो आंसू बहा-बहा कर इश्वर से पूछते हैं “मैंने ऐसा क्या किया जो आज ये दिन देखने पड़ रहे हैं”.


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